अब इस भावनात्मक थकान को थोड़ा बाहर से देखने की ज़रूरत है।
यह समझने की कि जो आप महसूस कर रहे हैं, वह कितना आम है और किस तरह धीरे-धीरे बनता है।
आज के समय में भावनात्मक थकान कोई rare स्थिति नहीं है।
कई international workplace studies बताती हैं कि burnout के 70–80% मामलों की शुरुआत emotional exhaustion से होती है। दिलचस्प बात यह है कि ज़्यादातर लोग इसे मानसिक नहीं, बल्कि सिर्फ शारीरिक थकान मान लेते हैं — और यहीं पहचान चूक जाती है।
कामकाजी लोग, घर की ज़िम्मेदारियाँ उठाने वाले, caretakers, और वे लोग जो सब संभाल लेते हैं — सबसे ज़्यादा प्रभावित पाए जाते हैं। वजह सीधी है: इन लोगों पर demands लगातार बढ़ती जाती हैं, लेकिन recovery के लिए समय नहीं मिलता।
Emotional Exhaustion अचानक नहीं होता
यह किसी एक दिन की घटना नहीं है।
न ही किसी बड़े trauma की ज़रूरत होती है।
मनोविज्ञान में इसे slow accumulation कहा जाता है —
छोटे-छोटे दबाव, जो रोज़ जुड़ते जाते हैं।
- काम की expectations
- emotional responsibilities
- खुद से ऊँची उम्मीदें
- और रुकने का guilt
जब demands बढ़ती रहती हैं और recovery absent रहती है, तो मन धीरे-धीरे थकता है।
यह थकान शोर नहीं करती — यह चुपचाप जमा होती है।
काम का role: जब काम खत्म होकर भी दिमाग बंद नहीं होता
आज productivity culture में एक बात बहुत आम है —
काम का समय खत्म हो जाता है, लेकिन काम दिमाग में चलता रहता है।
आप आराम कर रहे होते हैं, फिर भी guilt रहता है।
फोन न उठाने पर बेचैनी होती है।
और छुट्टी के दिन भी मन पूरी तरह off नहीं होता।
कई studies यह दिखाती हैं कि जब self-worth को productivity से जोड़ दिया जाता है, तो rest कमाया हुआ लगता है, ज़रूरी नहीं।
यही सोच emotional exhaustion को तेज़ करती है।
यहाँ समस्या काम नहीं है —
समस्या है काम से अलग न हो पाना।
रिश्तों में emotional labour: जो दिखता नहीं, पर थकाता है
रिश्तों में एक invisible काम होता है — emotional labour।
मतलब, माहौल संभालना, बातों को smooth रखना, और खुद को पीछे रखना।
- कोई बात नहीं कह देना
- अपनी बात बाद में रखना
- सामने वाले की emotional comfort को priority देना
Research patterns बताते हैं कि जो लोग रिश्तों में ज़्यादा emotional management करते हैं, उनमें emotional exhaustion की संभावना ज़्यादा होती है — क्योंकि देने का सिलसिला चलता रहता है, लेने का नहीं।
यह blame की बात नहीं है।
यह बस एक pattern है, जिसे पहचानना ज़रूरी है।
अकेलापन: लोगों के बीच रहते हुए भी
Emotional exhaustion का एक बड़ा कारण वह अकेलापन है, जो बाहर से नहीं दिखता।
आप लोगों के साथ होते हैं।
बातें भी होती हैं।
लेकिन वो बातें नहीं, जो सच में भारी हैं।
मनोविज्ञान में इसे emotional invisibility कहा जाता है —
जब आप मौजूद होते हैं, लेकिन समझे नहीं जाते।
यह अकेलापन अचानक महसूस नहीं होता।
यह तब बनता है, जब हम बार-बार सोचते हैं —
यह बात अभी कहने लायक नहीं है।
अगर ये बातें familiar लगें, तो ध्यान दें
यह diagnosis नहीं है —
सिर्फ self-recognition है।
- छोटी बातों से जल्दी drain हो जाना
- बिना वजह irritability
- अकेले रहने की craving
- दूसरों की समस्याएँ सुनने की ताक़त कम होना
- किसी चीज़ से खास खुशी न मिलना
अगर इनमें से कुछ आपको पहचान जैसी लगें, तो इसका मतलब यह नहीं कि आप कमज़ोर हैं।
इसका मतलब है कि pressure लंबे समय से चला आ रहा है।
एक छोटा reality check
भावनात्मक थकान कोई personal failure नहीं है।
यह prolonged pressure का natural response है।
जब ज़िंदगी रुकने नहीं देती,
तो मन थकता ही है।
आगे क्या
अब हमने यह समझना शुरू किया है कि emotional exhaustion कितना common है और कैसे develop होता है —
काम, रिश्तों और अकेलेपन के बीच।
अगले ब्लॉग में सवाल बदलेगा —
अब इससे बाहर निकलने की शुरुआत कैसे हो?
Emotional Exhaustion – PART 3 के लिए हमारे साथ जुड़े रहें।
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8 Comments
Nice read
ReplyDeleteThanx
DeleteNice blog.👍
ReplyDeleteThanx
ReplyDeleteNicely written
ReplyDeleteThanx
DeleteI like reading your blogs they are well written and they are too relatable 🙌 keep posting more😇
ReplyDeleteGlad you like it! Keep Supporting 😊
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