Part 1 में हमने उस पहचान की बात की थी, जहाँ ज़्यादा महसूस करना कभी आपकी खूबी हुआ करता था। लेकिन जैसे-जैसे दुनिया तेज़ होती गई, वही खूबी सवाल बन गई। अब यहीं से एक और चीज़ चुपचाप शुरू होती है — ज़्यादा सोचना।
Overthinking अचानक नहीं आती। यह किसी एक दिन में पैदा नहीं होती। यह धीरे-धीरे बनती है, लगभग बिना आवाज़ किए। अक्सर इसकी शुरुआत किसी बड़ी परेशानी से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी बातों से होती है। किसी की कही हुई एक लाइन, किसी का देर से दिया गया जवाब, या किसी का बदला हुआ व्यवहार।
ज़्यादा महसूस करने वाले लोग इन बातों को हल्के में नहीं छोड़ पाते। वे उन्हें वहीं छोड़ने की कोशिश करते हैं, लेकिन मन वापस वहीं लौट आता है। वे बार-बार वही पल याद करते हैं और खुद से पूछते हैं कि कहीं उन्होंने कुछ गलत तो नहीं कह दिया, या कहीं सामने वाले ने कुछ और तो नहीं सोच लिया।
धीरे-धीरे यह आदत बन जाती है।
समस्या सोचने में नहीं होती। सोच तो हर कोई करता है। समस्या तब शुरू होती है, जब दिमाग को रुकना नहीं आता। जब हर बात को समझ लेना ज़रूरी लगने लगता है। जब हर स्थिति को control करने की कोशिश होती है, ताकि कुछ भी गलत न हो।
ज़्यादा महसूस करने वाले लोग अक्सर ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि वे किसी को दुख नहीं देना चाहते। वे हालात बिगाड़ना नहीं चाहते। वे रिश्तों में clarity चाहते हैं। लेकिन यह clarity ढूँढते-ढूँढते वे खुद थकने लगते हैं।
कई बार उन्हें खुद भी समझ नहीं आता कि वे इतना क्यों सोच रहे हैं। बाहर से देखने पर सब ठीक लगता है, लेकिन भीतर दिमाग लगातार active रहता है। दिन में भी और रात में भी। चुप्पी भी उन्हें आराम नहीं देती, क्योंकि दिमाग वहीं बातें दोहराता रहता है।
Overthinking अक्सर self-protection से आती है। यह मन का एक तरीका होता है खुद को सुरक्षित रखने का। लेकिन जब यह आदत बन जाती है, तो यही सुरक्षा धीरे-धीरे बोझ बन जाती है। दिमाग हर समय alert रहता है, जैसे उसे कभी आराम करने की इजाज़त ही नहीं मिली हो।
अगर आप भी ऐसे हैं, जो हर बात का मतलब ढूँढने लगते हैं, हर बातचीत को analyze करते हैं, और बाद में खुद से सवाल पूछते रहते हैं — तो इसका मतलब यह नहीं कि आप कमज़ोर हैं। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि आप चीज़ों को गहराई से लेते हैं।
और शायद यही वह जगह है, जहाँ आपको पहली बार रुकने की ज़रूरत है।
हर सवाल का जवाब मिलना ज़रूरी नहीं होता।
हर बात को समझ लेना भी ज़रूरी नहीं होता।
कुछ चीज़ें बिना meaning के भी वैसी ही रहने दी जा सकती हैं।
यह सीखना आसान नहीं होता, खासकर उनके लिए जो ज़्यादा महसूस करते हैं। लेकिन यही वह मोड़ है, जहाँ overthinking धीरे-धीरे हल्की होनी शुरू होती है — जब आप हर बात को पकड़कर रखने के बजाय, कुछ बातों को जाने देना सीखते हैं।
आगे क्या
अगले भाग में हम उस जगह की बात करेंगे जहाँ ज़्यादा महसूस करने वाले लोग सबसे ज़्यादा थकते हैं — रिश्तों में।
क्यों वे अक्सर खुद को सबसे आख़िर में रखते हैं, और boundaries बनाना उनके लिए इतना मुश्किल क्यों हो जाता है।
People Who Feel Too Much – PART 3
यहीं से आगे बढ़ेगा।
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कभी-कभी पहचान ही सबसे बड़ा सहारा बन जाती है।
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3 Comments
This is so true.
ReplyDeleteVery true
ReplyDelete💯 well explained
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