कई बार ज़िंदगी में ऐसा होता है कि बाहर से सब ठीक दिखता है। काम चल रहा होता है, रिश्ते भी हैं, दिन भी कट जाता है — फिर भी भीतर कहीं कुछ भारी-सा रहता है। कोई साफ वजह नज़र नहीं आती, कोई बड़ी परेशानी भी नहीं होती, लेकिन मन हल्का महसूस नहीं करता।
अक्सर लोग इसे
साधारण थकान समझकर टाल देते हैं, पर ज़्यादातर मामलों में यह सिर्फ शरीर की नहीं, मन
की थकान होती है।
यह एहसास
अचानक नहीं आता
मन अचानक भारी
नहीं होता। यह धीरे-धीरे बनता है। जब हम बार-बार अपनी भावनाओं को दबाते हैं, जब कुछ
बुरा लगता है लेकिन हम उसे ज़ाहिर नहीं करते, और जब थकने के बाद भी खुद को रुकने नहीं
देते।
हर बार जब हम
खुद से कहते हैं — अभी इसे संभाल लेते हैं— तब मन में थोड़ा और भार जुड़
जाता है।
इसके कुछ
आम संकेत
यह अवस्था हर
किसी में अलग दिख सकती है, लेकिन अक्सर इसके कुछ संकेत होते हैं। बिना वजह चिड़चिड़ापन,
लोगों के बीच रहते हुए भी खालीपन, सब ठीक होने के बाद भी सुकून न मिलना, और हर समय
मज़बूत बने रहने की थकान।
ये संकेत अक्सर
नज़रअंदाज़ कर दिए जाते हैं, क्योंकि बाहर से ज़िंदगी सामान्य लगती है।
यह स्थिति
किन लोगों में ज़्यादा होती है
यह स्थिति ज़्यादातर
उन लोगों के साथ होती है जो ज़िम्मेदार होते हैं। जो काम, रिश्ते और उम्मीदें — सब
कुछ संभालने की कोशिश करते हैं।
ऐसे लोग शिकायत
कम करते हैं, लेकिन सहन ज़्यादा। वे दूसरों को परेशान नहीं करना चाहते, इसलिए अपनी
परेशानी को छोटा समझ लेते हैं। धीरे-धीरे यही आदत मन को थका देती है।
यह कमजोरी
नहीं है
मन का भारी
होना कमजोरी नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि आपने लंबे समय तक खुद को अनदेखा किया
है। आपने दूसरों की ज़रूरतों को समझा, लेकिन अपनी ज़रूरतों को हमेशा बाद में
रखा। मन उसी बाद में का बोझ
उठाए रहता है।
इससे बाहर
आने का मतलब क्या नहीं है
इस स्थिति से
बाहर आने का मतलब यह नहीं है कि आपको तुरंत कोई बड़ा बदलाव करना पड़े या पूरी ज़िंदगी
पलटनी पड़े। अक्सर मन बस इतना चाहता है कि आप थोड़ी देर रुकें और बिना खुद को जज किए
यह देखें कि अंदर क्या चल रहा है।
शुरुआत छोटे
कदमों से होती है
व्यावहारिक
तौर पर शुरुआत बहुत साधारण होती है। यह मान लेना कि इस समय मन ठीक नहीं है। यह स्वीकार
करना कि हर दिन मज़बूत रहना ज़रूरी नहीं। अपनी थकान को नाम देना, उसे सही ठहराने की
कोशिश किए बिना। दिन में एक पल ऐसा रखना जहाँ आप कुछ साबित न करें।
ये छोटे
कदम मन को सांस लेने की जगह देते हैं।
खुद से पूछने
के लिए कुछ सवाल
इन सवालों के
जवाब तुरंत मिलें, यह ज़रूरी नहीं। कई बार सवाल ही सोच की दिशा बदल देते हैं।
v 👉 मैं किस बात को लगातार टाल रहा हूँ?
v 👉 क्या मैं अपनी ज़िंदगी जी रहा हूँ या सिर्फ निभा रहा हूँ?
v 👉 मैं कब से खुद के लिए नहीं रुका हूँ?
v 👉 अगर मैं आज थोड़ा कम मज़बूत रहूँ, तो क्या सच में कुछ बिगड़ जाएगा?
मनोवैज्ञानिक
रूप से इसे क्या कहा जाता है
मनोविज्ञान
में इस अवस्था को भावनात्मक थकान (Emotional Exhaustion) कहा जाता है। इस ब्लॉग
में हमने इस एहसास को पहचाना है, उसे नाम दिया है, और यह समझा है कि यह कोई कमजोरी
नहीं है।
आगे क्या
अगले ब्लॉग
में हम समझेंगे कि भावनात्मक थकान किन वजहों से होती है, काम, रिश्ते और अकेलापन इसमें
कैसे भूमिका निभाते हैं, और हम अनजाने में कौन-सी आदतों से इसे बढ़ाते जाते हैं — ताकि
मन के इस भारीपन को सिर्फ महसूस ही न किया जाए, बल्कि समझने की शुरुआत भी हो सके।
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6 Comments
very true .i can connect wid this
ReplyDeleteGlad you like it! Keep Supporting 😊
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DeleteRelatable
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